November 17, 2018
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विवादित बिल को लेकर राजस्थान की वसुंधरा सरकार घिरी, विपक्ष के साथ सत्तापक्ष ने भी जताया कड़ा विरोध

जनमंथन, जयपुर। राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही आज पहले ही दिन काफी हंगामेदार रही। विवादित दंड विधि राजस्थान संशोधन विधेयक, 2017 और दण्ड प्रक्रिया संहिता राजस्थान संशोधन विधेयक पर राजस्थान की वसुंधरा सरकार मुश्किल में पड़ती नजर आ रही है। इस बिल को लेकर कांग्रेस ने पैदल मार्च के बाद सदन में भी जमकर हंगामा किया। इस बिल का विपक्ष के साथ सत्तापक्ष के विधायकों ने भी कड़ा विरोध किया।

राजस्थान विधानसभा के शीतकालीन सत्र का पहला दिन काफी हंगामेदार रहा। सदन की कार्यवाही शुरु होते ही उपनेता प्रतिपक्ष रमेश मीणा विवादित दण्ड प्रक्रिया संहिता राजस्थान संशोधन विधेयक और दण्ड विधि राजस्थान संशोधन विधेयक पर बोलने लगे। उन्होंने इस बिल को काला कानून बताया। उनके साथ गोविंद डोटासरा और भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी बोलने लगे। उन्होंने इस बिल को भ्रष्टाचार को संरक्षण और मीडिया की आवाज दबाने वाला बताया। कांग्रेस ने विधेयक को काला कानून बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने बोलने की अनुमति नहीं दी और इस घटनाक्रम को अंकित नहीं करने के भी निर्देश दिए।

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शोकाभिव्यक्ति के बाद सदन की कार्यवाही 24 अक्टूबर सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई इसके बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में कई कांग्रेसी बिल के विरोध में राज्यपाल को ज्ञापन देने राजभवन पहुंचे। इस दौरान पायलट सहित कई कांग्रेसी नेताओं को हिरासत में लिया गया। राज्यपाल की गैर मौजूदगी में कांग्रेस ने राज्यपाल के सचिव देवाशीष पुष्टी को ज्ञापन सौंप दिया।

विपक्ष के साथ ही सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी इस विधेयक को काला कानून कहा है। सदन में बोलने की अनुमति नहीं देने से नाराज भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने इस पर वॉकआउट कर दिया। थोड़ी देर बाद कांग्रेस विधायक भी सदन के बाहर चले गए। हालांकि दस मिनट बाद विधायक तिवाड़ी और कांग्रेस विधायक फिर सदन में लौट आए। इस दौरान निर्दलीय विधायक माणिकचंद सुराणा ने भी बिल को लेकर नाराजगी जताई। सुराना ने इस संशोधन विधेयक की तुलना इमरजेंसी से की। वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाडी ने कहा है कि ‘चाहे सदस्यता ही दांव पर लगानी पडे और चाहे आलाकमान रोके इस काले कानून को राजस्थान में लागू नहीं होने देंगे”।

भाजपा के ही वरिष्ठ विधायक नरपतसिंह राजवी ने कहा है कि भ्रष्टाचारी और बेईमानों को संरक्षण देने वाले इस बिल की कोई जरूरत राजस्थान में नहीं थी। राजवी ने कहा कि मीडिया पर भी इस बिल में सेंसरशिप लगाई जा रही है जो कतई ठीक नहीं। उन्होंने कहा कि आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के लिए 6 माह का वक्त तो क्या 6 दिन का वक्त भी नहीं मिलना चाहिए। राजवी ने कहा कि इस बिल को लाने से पहले वसुंधरा सरकार ने थोड़ा भी विचार नहीं किया।

नरपतसिंह राजवी ने ये कहाः-

विधायक माणिकचंद सुराणा ने सदन के बाहर भी इस विधेयक पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सीएम वसुंधरा राजे अपने 11 महीने के बचे हुए कार्यकाल में इस काले कानून को पास कराने का ठीकरा अपने माथे क्यों फोड़ना चाहती है। सुराणा ने मीडिया से कहा कि सरकार को इस बिल को लेकर बैकफुट पर आना पडेगा नहीं तो जनता फ्रंटफुट पर आएगी, जिसका मतलब आप समझते ही है। सुराणा ने कहा कि न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों को बिना अनुमति के प्रोसीक्यूशन नहीं हो सकता है, वे पहले से ही प्रोटेक्ट हैं। राज्य सरकार को इसकी चिन्ता करने की जरूरत ही नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य मामलों में भी पहले से देश में कानून है धारा 182 के तहत् गलत रिपोर्ट दर्ज कराने के मामले में 2 साल की सजा का प्रावधान पहले से ही है। माणिकचंद सुराणा ने इस दौरान गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया पर भी निशाना साधा।

माणिक चंद सुराणा का बयान:-

इस विवादास्पद विधेयकों पर अब 26 अक्टूबर को सदन में बहस होगी। सदन और सदन के बाहर घिरती वसुंधरा सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि जितने भी लोगों ने बिल को लेकर सुझाव रखे हैं उन पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि विधेयक को मुकदमों के पेंडेंसी को देखते हुए लाया गया है। कटारिया ने कहा कि ढाई लाख मुकदमे राजस्थान में सीआरपीसी की धारा 156 के अंतर्गत दर्ज हुए हैं जिनमें से 73 फीसदी झूठे हैं। गृहमंत्री ने कहा कि किसी व्यक्ति पर बिना आरोप साबित हुए मीडिया धमाधम शुरू हो जाता है उस पर भी लगाम लगेगी। कटारिया ने कहा कि जो कानून तोडेगा उसे तो जेल होगी ही।

कांग्रेस विधायक घनश्याम मेहर का बयानः-

विवादित दंड विधि राजस्थान संशोधन विधेयक-2017 और दण्ड प्रक्रिया संहिता राजस्थान संशोधन विधेयक ने राजस्थान में तूल पकड़ लिया है। एक ओर जहां केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्ति का नारा लगा रही है वहीं यह बिल राजस्थान की वसुंधरा सरकार पर सवाल खडे कर रहा है। यह सवाल हैं कि मानहानि का कानून पहले से ही मौजूद है तो फिर सरकार को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) और 190 (1) में परिवर्तन की क्या जरूरत आन पड़ी।

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