November 17, 2018
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इस छोटी सी भूल से भोलेनाथ शिव हो जाते हैं कुपित, हो जाते हैं पूजा के सभी पुष्ण नष्ट

जनमंथन, उज्जैन। भगवान शिव को भोलेनाथ भी कहा जाता है, कहा भी क्यों नहीं जाए विधि विधान के बिना उपासना करने वाले भक्तजन पर भी महादेव कृपा बरसा देते हैं। शिव पुराण में भी ऐसी कई कथाएं हैं जिनमें शिव शंकर ने निंदनीय व्यक्तियों की भूल को भी उनके प्रति भक्ति समझ उस पर कृपा बरसाई थी। यही वजह है कि भगवान शिव के वृत्त, पूजा अर्चना और उनकी उपासना सभी देवीदेवताओं से ज्यादा आसान है। भगवान महादेव की मानस पूजा का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें महादेव बगैर कुछ भोग लिए मन से अर्पित भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन आज हम आपको बताते हैं भोलेनाथ शिव की पूजा के दौरान एक छोटी सी भूल उन्हें अप्रसन्न कर देती है।

सनातन धर्म में सभी देवीदेवताओं की पूर्ण परिक्रमा करने का विधान है लेकिन शिवालयों में अर्ध परिक्रमा करना ही उचित माना गया है। शास्त्रों के मुताबिक शिवालयों में मौजूद शिवलिंग की परिक्रमा पूरी करने के दौरान बीच में निर्मली आ जाती है। शिवलिंग पर दुग्ध, जल अर्पित करने के बाद जिस नालीनुमा आकृति से वह बहकर आगे निकलता है इसी आकृति को निर्मली कहते हैं। निर्मली को लांघने पर भगवान भोलेनाथ कुपित हो जाते हैं और भक्त के सभी पुण्य और फल नष्ट हो जाते हैं। इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार गंधर्व का राजा पुष्पदंत भगवान शिव का अनन्य भक्त था। गंधर्वराज पुष्पदंत भगवान शिव की पूजा में दिनरात लगा रहता था। इस दौरान वह कई तरह के सुगंधित और ताजा फूल, बेलपत्र और फलों से शिव की पूजा अर्चना करता था।

पूजा के लिए सुगंधित और ताजा फूल तोड़ने के लिए पुष्पदंत एक दूसरे राजा के पुष्पवन में जाया करता था। उस पुष्पवन का माली इस बात से अचरज में था कि जो भी खूबसूरत पुष्प शाम को वह खिलते हुए देखता था वे फूल सुबह नहीं मिलते थे। उसने इस पुष्प चोर को पकड़ने के लिए बड़ी निगरानी शुरु कर दी। कई दिनों के बाद भी जब माली पुष्प चोर को नहीं पकड़ सका तो उसने राजा से शिकायत कर दी।

राजा को जब इस घटना का मालूम हुआ तो उसने पुष्पवन में पहरेदार बैठा दिए। ये पहरेदार भी दिनरात पहरा देते रहे लेकिन पुष्प चोर को पकड़ नहीं पाए। वास्तविकता यह थी कि पुष्प चोरी करने वाले शिवभक्त पुष्पदंत को अदृश्य रहने की शक्ति प्राप्त थी। वह जब चाहता था अदृश्य हो जाता था।

एक दिन गंधर्वराज पुष्पदंत भगवान शिव की परिक्रमा करते हुए निर्मली को लांघ गया। दूसरे दिन वह फिर से पुष्प लेने फिर से राजा के पुष्पवन में पहुंचा। पुष्पवन के माली को वह नजर आ गया और उसने पहरेदारों की मदद से उसे पकड़ लिया। व्याकुल हुए पुष्पदंत ने भोलेनाथ का स्मरण किया और कहा प्रभो मुझे इस दुविधा से बाहर निकालो। महादेव की कृपा से माली ने आगे ऐसा नहीं करने की चेतावनी देकर पुष्पदंत को छोड़ दिया।

देंखें इस कथा को वीडियो में-

माली से मुक्त हुए पुष्पदंत ने फिर से वहीं बैठकर शिवमहिम्न स्तोत्र की रचना कर भगवान शिव की उपासना की। भगवान आशुतोष शिव इस शिवमहिम्न स्तोत्र से अति प्रसन्न हुए। शिव पुष्पदंत से बोले वत्स, तुमने परिक्रमा करते हुए शिवालय की निर्मली को लांघ लिया था इसी से तुम्हारी अदृश्य होने की शक्ति समाप्त हो गई थी। महादेव शिव ने कहापुष्पदंत मांगों क्या वर चाहिए? मैं वही दूंगा जो तुम मांगोगे, निःसंकोच मांगो।

ऐसे में गंधर्वराज पुष्पदंत ने फिर से अदृश्य होने की शक्ति मांग ली। भोलेनाथ तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद से शिवलिंग या शिवालय की परिक्रमा के दौरान निर्मली को लांघना बहुत बड़ा दोष माना जाने लगा। हांलाकि यह पानी की नाली (निर्मली) अगर ढकी हुई हो तो उसे लांघा जा सकता है।

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