November 17, 2018
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पितृदोष के लक्षण, कारण और सरल निवारण

जनमंथन, हरिद्वार। पितृदोष व्यक्ति के जन्म, कर्म और धर्म से जुड़ा ऐसा रहस्य है जिसका आभास जीवन में लगातार आ रहे संकटों से होता है। आज की युवा पीढी विज्ञान के इस युग में महज वैज्ञानिकता को ही संसार की गति का कारण मानती है। लेकिन इसके परे भी ऐसी रहस्यमयी दुनिया है जो व्यक्ति का पीछा जीवन और जीवन के बाद तक नहीं छोड़ती। वहां हर व्यक्ति के जन्म, कर्म और धर्म का हिसाब लगाया जाता है और उसी के आधार पर उसे अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। प्रकृति या ईश्वरीय संतुलन की इसी महत्वपूर्ण कड़ी को पितृदोष कहते हैं। पितृदोष किसी भी व्यक्ति के जीवन और उसकी कुंडली को ऐसा प्रभावित करता है कि उसका जीवन कठिन हो जाता है।

परिवार के किसी पूर्वज की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार विधि विधान से नहीं हो पाता है या फिर जीते जी उनकी कोई कामना पूरी नहीं हुई हो तो ऐसे पूर्वजों की आत्मा अपने घर और आने वाली पीढियों तक भटकती रहती है। इन मृत पूर्वजों की अतृप्त आत्मा परिवार के सदस्यों पर अपनी इच्छापूर्ति के लिए उनका ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती है। शुरुआती कुछ घटनाओं के बाद भी जब व्यक्ति नहीं चेतता तो फिर ये अतृप्त आत्माएं परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए उन्हें परेशान करना शुरु कर देती है। इस स्थिति में पितृदोष के लक्षण जातक की कुंडली में साफ नजर आते हैं।

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पितृदोष के लक्षण

पितृदोष के कारण व्यक्ति को भारी कष्टों का सामना करना पड़ता है। पितृदोष के चलते विवाह का नहीं होना या विवाह में देरी, विवाह हो गया तो विवाहित जीवन में कलह, परीक्षा में निरंतर असफलता, नशे की भयंकर लत लगना, कई उपाय करने के बावजूद संतान का ना होना, अगर संतान होती भी है तो बार-बार पुत्रियों का होना या फिर मंदबुद्धि संतान का होना। निर्णय लेने की क्षमता की कमी और स्वभाव में हमेशा क्रोध रहना।

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ज्योतिष के मुताबिक पितृदोष

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक सूर्य और मंगल दोनों ग्रहों की स्थिति ही व्यक्ति के जीवन में पितृदोष को तय करती है। ज्योतिषियों के मुताबिक सूर्य को पिता तो मंगल को रक्त का कारक माना जाता है। ऐसे में जब किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य और मंगल दोनों ग्रह पाप भाव में एक साथ बैठ जाते हैं तो व्यक्ति का जीवन पितृदोष से घिर जाता है।

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श्राद्ध कर्म

हिन्दू शास्त्रों और धर्म ग्रन्थों में बताया गया है कि मृत्यु के बाद पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध कर्म ही मृतक की आत्मा को मुक्ति दिलाता है। हांलाकि आधुनिक जमाने में कुछ लोग पुत्र के नहीं होने पर पुत्री से भी अंतिम संस्कार करवा लेते हैं लेकिन इसे शास्त्रों के अनुकूल नहीं माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस व्यक्ति के पुत्र नहीं होते उसकी आत्मा कभी भी मुक्त नहीं हो पाती है और हमेशा भटकती रहती है साथ ही आगामी पीढ़ी के लोगों को भी पुत्र प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करती है। इसीलिए लोग पुत्र रत्न प्राप्ति की कामना करते हैं।

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पिता की हत्या

ऐसा व्यक्ति जिसने अपने पिता की हत्या की हो, पिता को दुख पहुंचाता है या फिर बुजुर्गों का अपमान किया हो उसे अगले जन्म में पितृदोष का कष्ट झेलना ही पड़ता है। जिन व्यक्तियों को पितृदोष होता है उनके लिए धारणा यह भी है कि उनसे उनके पितृ दुखी हैं।

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पितृदोष दूर करने के उपाय

पितृदोष शांत करने के कई उपाय है लेकिन अपनी व्यस्तता और आधुनिक जीवन शैली में आस्था से परे होता व्यक्ति पितृदोष को ठीक से समझ भी नहीं पाता है। अब हम बताने जा रहे हैं पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को अपने सभी महत्पूर्ण कार्य छोड़ पहले अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म संपन्न करना जरूरी है। व्यक्ति भले ही अपने जीवन में कितना भी बिजी रहता हो लेकिन उसे अश्विन कृष्ण अमावस्या को श्राद्ध जरूर करना चाहिए। आइये जानते हैं पितृदोष को शांत करने के कुछ महत्पूर्ण उपाय।

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सूर्यदेव को जल चढाएं

शुक्लपक्ष के पहले रविवार को पितृदोष से पीडित व्यक्ति को घर में विधि-विधान से ‘सूर्ययंत्र’ स्थापित करना चाहिए। इसके बाद सूर्यदेव को रोजाना ताम्र (तांबे) के पात्र में जल भरकर, उसमें लाल पुष्प, रोली और चावल डालकर, अर्घ्य देने से पितृदोष शांत होता है।

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पीपल पर चढाएं जल

बृहस्पतिवार के दिन सांयकाल में पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाने और फिर 7 बार परिक्रमा करने से व्यक्ति पर पितृदोष का असर कम होने लगता है।

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पूर्वजों से आशीर्वाद

शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को शाम के समय पानी वाला नारियल अपने ऊपर से सात बार वारकर बहते जल में प्रवाहित कर दें और अपने पूर्वजों से मांफी मांगकर उनसे आशीर्वाद मांगे।

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थाली से निकालें गाय का हिस्सा, खिलाएं रविवार को गुड़

पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को अपने भोजन की थाली में से गाय के लिए और कुत्ते के लिए कुछ हिस्सा निकालना चाहिए। इसके साथ ही अपने कुलदेवी और कुलदेवता का हमेशा पूजा पाठ करते रहना चाहिए। हर रविवार को गाय को गुड़ खिलाना चाहिए, यहां तक कि व्यक्ति खुद घर से बाहर जाए तो गुड़ खाकर ही निलते। घर में भागवत कथा का पाठ कराने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी आत्मा को तृप्ति मिलती है।

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