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February 6, 2019
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दानवों के राजा बलि को क्यों बांधी थी महालक्ष्मी ने राखी ? जानिये एक रोचक पौराणिक कथा

जनमंथन, जयपुर। रक्षा बंधन को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन विष्णु पुराण में दानवों के राजा बलि से जुड़ी एक कथा सबसे ज्यादा प्रचलित हैं। विष्णु पुराण के मुताबिक स्वर्ग को जीतने के लिए दानवों के राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूरे कर लिए तो इंद्रासन डोलने लग गया। देवताओं के राजा इन्द्र और अन्य देवताओं ने तब रक्षा के लिए भगवान नारायण की स्तुति की।

भगवान विष्णु ने इस दौरान राजा बलि का 101 वां यज्ञ विफल करने के लिए योजना बनाई और वामन अवतार लेकर यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। ब्राह्मण वेषभूषा में उन्होंने राजा बलि से भिक्षा मांगी। दानवीरों में सर्वश्रेष्ठ कहे जाने वाले राजा बलि ने वामन भगवान से उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दिया। इस दौरान वामन अवतार लिए भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग जमीन भिक्षा के रुप में मांगी।

दानवराज बलि के गु्रु शुक्राचार्य ने ब्राह्मण रुप लिए भगवान विष्णु को पहचानकर राजा बलि को सचेत रहने को कहा। हांलाकि दानवीरता के लिए कटिबद्ध राजा बलि ने गुरू शुक्राचार्य की नहीं सुनी और वचन का पालन करते हुए उन्होंने तीन पग जमीन दान कर दी।

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वामन रुप लिए भगवान विष्णु ने अपना विकराल रुप धारण कर लिया और पहले पग से स्वर्गलोक तो दूसरे से पृथ्वीलोक को नाप लिया। अब भगवान ने राजा बलि से पूछा कि वे तीसरा पैर कहां रखें? जवाब में राजा बलि ने अपना मस्तक झुकाते हुए भगवान वामन को अपना तीसरा पग उनके सिर पर रखने को कहा। भगवान विष्णु ने अपना तीसरा पैर राजा बलि के सिर पर रखा।

दानवीर श्रेष्ठ राजा बलि की इस दानवीरता से भगवान विष्णु अति प्रसन्न हुए। भगवान नारायण ने अपने चतुर्भुज रुप में दर्शन देकर राजा बलि को मनवंतर में स्वर्ग के राजा इन्द्र बनने का वरदान दिया और तब तक रसातल लोक में वास करने का आदेश दिया।

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भूलोक से अपना सबकुछ दान कर चुके राजा बलि ने भगवान विष्णु के आदेश की पालना की और रसातल लोक में वास करने लगे। इस बीच वे भगवान विष्णु की भक्ति में लीन हो गए। भगवान विष्णु ने फिर से राजा बलि को दर्शन दिए तो राजा बलि ने दिन- रात उनके सामने रहने का वचन मांग लिया। भगवान विष्णु को ऐसे में राजा बलि का द्वारपाल बनना पड़ा। भगवान विष्णु के रसातल लोक में चले जाने के बाद महालक्ष्मी काफी दुखी हुई। बैकुंठ धाम भी नारायण के बिना सूना हो गया।

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काफी समय गुजर जाने के बाद भी जब भगवान बैकुंठ धाम नहीं आए तो महर्षि नारद ने देवी लक्ष्मी को एक युक्ति सुझाई। इसके बाद लक्ष्मीजी ने रसातल लोक में जाकर दानवराज बलि को राखी बांधकर भाई बना लिया और उपहार के रुप में भगवान विष्णु को मांग लिया। इस खास दिवस श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। इस खास तिथि को बाद में रक्षा बंधन के रुप में मनाया जाने लगा। इस पौराणिक कथा को पढने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देवी लक्ष्मी ने ही दानव राज बलि को संसार में सबसे पहले राखी बांधी थी।

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