राम ने नहीं उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने मारा था रावण को - Jan Manthan : latest news In Hindi , English
February 6, 2019
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राम ने नहीं उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने मारा था रावण को

जनमंथन, जयपुर। हिन्दू अनुयायी हर साल विजयदशमी का पर्व मनाते हैं और बुराई के प्रतीक रावण का इस दिन भगवान राम वध करते हैं। जी हां रामलीलाओं में टेलीविजन पर प्रसारित होने वाली रामायण और फिल्मों में भी ऐसा ही कुछ दिखाया जाता है। सनातनी हिन्दुओं के साथ ही अन्य धर्म और संप्रदायों के लोग भी यह जानते हैं कि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण कथा में राम ने ही रावण का वध किया था। इस कथा के मुताबिक विष्णु के अवतार भगवान राम ने पत्नी सीता को लंका के राजा रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए युद्ध में उसे परास्त कर उसका जीवन समाप्त किया था।

मगर विश्व के करोड़ों हिन्दुओं और सनातन धर्म की भावनाओं से जुड़ी इस कथा के परे एक और कथ भी प्रचलित है। यह कथा राजस्थान की लोक कथाओं में भी बड़ी प्रचलित है। इस कथा के मुताबिक दशानन रावण का वध राम ने नहीं बल्कि उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने किया था।

यह चौंकाने वाली बात है लेकिन राजस्थानी लोक कथाओं में कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता है। इन लोक कथाओं के मुताबिक लक्ष्मण ने ही रावण को मारा था। रामायण कथा के मुताबिक रावण की जान उसकी नाभि में मौजूद अमृत कलश में बताई जाती है लेकिन राजस्थान कथाओं में रावण की जान सूर्यदेव के रथ के एक घोड़े की नासिका में मौजूद थी जिसे मुक्त कराकर लक्ष्मण ने रावण की ईहलीला समाप्त की।

राजस्थान लोक कथाओं में लक्ष्मण को ब्रह्मचारी बताया गया है जबकि लंकापति रावण को यह वरदान था कि कोई ब्रह्मचारी व्यक्ति घोड़े की नासिका में मौजूद उसकी जान को पहचान पाएगा। कहते हैं इसीलिए लक्ष्मण ने घोड़े की नासिका में छुपी रावण की जान को पहचान कर उसका अंत कर दिया था।

राजस्थान का जैन समुदाय वाल्मिकी रामायण कथा की बजाय इस कथा पर ज्यादा विश्वास करता है। जैन समुदाय के मुताबिक लक्ष्मण ने ही रावण का वध किया था। इस समुदाय के लोग श्रीराम को अहिंसक व्यक्ति के रुप में पूजते हैं। इस अनोखी कथा के बारे में राजस्थान के गवैये अपनी गायकी के परंपरागत अंदाज में करते हैं। इन गवैयों को यहां भोपो भी कहा जाता है।

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ये गवैये पबूजी नाम के चरित्र के भी गीत गाते हैं। पबूजी का चरित्र राम, सीता और लक्ष्मण के पूर्व जन्म से जुड़ा है। पबूजी के चरित्र पर सुनाई जाने वाली यह कहानी 600 से भी ज्यादा सालों से राजस्थान में सुनने को मिलती हैं।

इस कहानी में दशानन रावण का पिछला जन्म जिन्धर्व खींची के रुप में बताया गया है जबकि कहा जाता है रावण की बहन शूर्पणखा राजकुमारी फूलवती के रुप में जन्मी थी। इस कथा के मुताबिक लक्ष्मण का पूर्व जन्म पबूजी के रुप में था। पबूजी के पिता दढल राठौड़ को बताया गया है उनकी पहली पत्नी से उन्हें दो संताने हुई थीं -बुरो और प्रेमा, ये दोनों पबूजी के सौतेले भाई बहन थे। जबकि पबूजी दढ़ल की दूसरी पत्नी से जन्में थे।

राजस्थानी लोककथाओं में जिक्र है कि दढल को किसी सुंदर युवती से प्रेम हो गया, तो उन्होंने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। मगर उस सुंदर युवती ने दढल के सामने सशर्त विवाह को मंजूर किया। युवती की शर्त यह थी कि दढ़ल कभी भी उस युवती से यह नहीं पूछेंगे कि वह रात्रि को कहां जाती है। सुन्दरता से मुग्ध दढ़ल युवती की शर्त को मान गए और उनका विवाह हो गया।

इस सुंदर युवती से दढ़ल को दो संतान प्राप्त हुई जिनमें एक पबूजी थे तो दूसरा सोना। जाने-अनजाने में एक रात दढल ने अपनी पत्नी का जंगल तक पीछा किया। जंगल का नजारा देखकर पहले तो दढ़ल हैरान रह गए। उनकी पत्नी एक शेरनी के रुप में अपने पुत्र पबूजी को दूध पिला रही थी। दढ़ल की पत्नी ने देखा कि उन्होंने वचन तोड़ दिया तो वह उन्हें जीवन पर्यन्त के लिए छोड गई। जाते हुए दढ़ल की पत्नी अपने पुत्र पबूजी को एक चमत्कारी घोड़ी (कलमी) के रुप में मिलने का वचन देकर गई।

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कुछ सालों बाद पबूजी के पिता दढल का निधन हो जाता है। ऐसे में संपूर्ण राज्य बड़े और सौतेले भाई बुरो के हाथ में आ जाता है। सत्ता के मद में चूर बुरो इस दौरान पबूजी को राज्य की संपत्ति से बेदखल कर देता है। इस कथा में देवी देवल नाम के चरित्र का भी जिक्र है जिसने पबूजी को एक चमत्कारी घोड़ी उपहार में दी थी। कहते हैं कि यही चमत्कारी घोड़ी पबूजी की मां का पुनर्जनन्म था।

कहा जाता है कि देवल के पास एक चमत्कारी गाय भी थी जिसकी रक्षा करने की शर्त पर उपहार में देवल ने पबूजी को चमत्कारी घोड़ी दी थी। पबूजी को चमत्कारी घोड़ी मिलने के बाद उनके सौतेले भाई बुरो के साथ उनके संबंधों में और ज्यादा कड़वाहट आ जाती है।

कहते हैं कि रावण के पूर्वजन्म कहे जाने वाले जिन्धर्व खींची के पिता के साथ इस दौरान पबूजी का युद्ध हो जाता है। युद्ध में पबूजी जिन्धर्व खींची के पिता का वध कर देते है। हांलाकि बाद में दोनों राज्यों में शांति बहाली और संबंध सुधरने की उम्मीद में पबूजी अपनी सौतेली बहन प्रेमा का विवाह जिन्धर्व खींची से कर देते हैं। लेकिन रिश्तेदारी जुड़ने के बावजूद जिन्धर्व की नजर बुरो की संपत्ति और देवी देवल की उस गाय पर थी जिसकी रक्षा का जिम्मा पबूजी के पास था।

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इस कथा में रावण की बहन शूर्पणखा के पूर्वजन्म का भी जिक्र है। बताया जाता है कि वह सिंध की राजकुमारी फूलवती थी जो पबूजी के पराक्रम और महानता की कायल हो गई थी। पबूजी में आसक्त हुई राजकुमारी फूलवती ने पबूजी के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। पहले तो पबूजी ने सदैव ब्रह्मचारी रहने की मंशा बताते हुए प्रस्ताव को ठुकरा दिया बाद में समझाइश के बाद वे विवाह को मान गए। आखिरकार फूलवती से उनका विवाह तय हो गया। लेकिन घटना के चलते दोनों का विवाह हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक अपूर्ण ही रह गया।

हुआ यूं कि पबूजी जैसे ही विवाह का चौथा फेरा लेने लगे तभी देवी देवल ने उनको आवाज लगाई और कहा कि उनकी गाय चोरी हो गई है। देवी देवल की गाय की रक्षा के वचन में बंधे पबूजी फेरे अधूरे छोडकर ही गाय को ढूंढने चले गए। गाय चुराने वाले जिन्धर्व खींची से पबूजी का युद्ध हुआ और इस युद्ध में भी पबूजी ही विजयी रहे। सौतेली बहन प्रेमा का सुहाग होने के चलते पबूजी ने जिन्धर्व को जीवन दान दे दिया। हांलाकि षडयंत्रकारी जिन्धर्व ने पबूजी को छलसे मारने की योजना बनाई और अपनी तलवार निकाल ली। इसी दौरान एक अनोखी घटना होती है और पबूजी अपनी घोड़ी समेत राम के पास स्वर्ग में चले जाते हैं। कहते हैं कि बाद में जिन्धर्व का वध बुरो का पुत्र रूपनाथ करता है।

 

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